मिलने को पार किए सात समुंदर उस को

लौट आए हैं फ़क़त हाथ लगा कर उस को

रौनक़-ए-शहर में याद आती है घर की अक्सर
खेंच लाएगी जुदाई मेरे दर पर उस को

ये अलग बात निभाया नहीं उस ने लेकिन
याद तो होगा हर इक अहद बराबर उस को

जानता हूँ कि वो लौटेगा मगर सोचता हूँ
आ गई रास अगर दुनिया बिछड़ कर उस को

कमरे में ख़त थे किताबें थी मैं था और सितार
क्या करूँ अब कि पसंद आया है बिस्तर उस को

'नाज़' वो अहद-शिकन लड़की पशेमाँ है सो वो
बे-वफ़ा है तो सही पर न कहा कर उस को

— Naaz ishq

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