"इबहाम"
ये कौन से नगर आया हूँ मैं कि ख़्वाब यहाँ
क़फ़स में हैं कि समेटे हुए हैं इल्म नहीं
तसव्वुरात किसी सानिहे की डोरी से
उलझ गए कि लपेटे हुए हैं इल्म नहीं
निगाह हो कि ज़बाँ हो कि शहर-ए-दिल कि यहाँ
हर एक शहर से पेचीदगी ज़ियादा है
बॅंधे हुए हैं ख़याल इतने और गहरा सुकूत
हर इक ख़याल ज़बाँ से परे निहादा है
ये कैसे होंठ कि जो जुम्बिशें नहीं करते
ये किस तरह की नज़र जिस
में तीरगी है फ़क़त
ये चाहते हैं सदाऍं सभी रसन बस्ता
ये कान हैं कि जिन्हें रास ख़ामुशी है फ़क़त
मैं थक के बैठ गया तो लगा कि दूर कहीं
दबी हुई सी सदाएँ पुकारती हैं मुझे
क़दम बढ़ाए तो कुछ ख़्वाहिशें दिखी और मैं
जिन्हें जिन्हें हूँ मुयस्सर निहारती हैं मुझे
शदीद ख़्वाब जो अल्हड़पने में देखे थे
मुझे वो आज बड़ी हसरतों से तकते हैं
बची हुई वफ़ा और अधमरी उमीद के साथ
तमाम शौक़ बड़ी नफ़रतों से तकते हैं
मैं इस के बा'द उतर आया और गहरा जहाँ
फ़क़त थी याद-ए-गुज़िशता ख़याल-ए-मुस्तक़बिल
मैं सेहन कर न सकूॅंगा अब और कुछ कि मुझे
यहाँ से ले चलो और छोड़ आओ शहर-ए-दिल
हर एक रोज़ वही रट वही सवाल कि 'नाज़'
तू जानता है यहाँ हिजरतें नहीं होती
ये खेल ज़ेहन में चलता है अहद-ए-फ़ुर्सत में
तो ले चलो कि जहाँ फु़र्सतें नहीं होती















