बहुत रौशनी से अँधेरे हुए
दिया बुझ गया तो उजाले हुए
ज़मीं आसमाँ कुछ नहीं था कि हम
परिंदे हैं पिंजरों में पाले हुए
लुटाने को अब कुछ बचा ही नहीं
मोहब्बत में ऐसे ख़सारे हुए
वो मुझ से कभी कुछ नहीं पूछती
झिझकती है कुछ भी बताते हुए
कि तुम लौट आओ लगा लो गले
हुई मुद्दतें मुझ को रोए हुए
जो दुनिया की नज़रों में है ख़ुश-मिज़ाज
वो रो पड़ती है शे'र पढ़ते हुए
वो चेहरा जो आँखों से ओझल नहीं
ज़माना हुआ 'नाज़' देखे हुए
— Naaz ishq















