ये सोच कर न किया मैं ने शोलगी का सफ़र
बहुत निढ़ाल करेगा ये वापसी का सफ़र
फिर ऐन वक़्त पे वो चैन खींच दी मैं ने
पहुॅंच गया था मोहब्बत पे दिल-लगी का सफ़र
मैं दोस्ती से मोहब्बत पे आया पहले फिर
गुज़र किया है मोहब्बत से दोस्ती का सफ़र
कि होती है किसी की इंतिहा सफ़र की जहाँ
वहाँ से जा के शुरू होता है किसी का सफ़र
कभी भी 'नाज़' उतर सकते हो ये रेल से तुम
कभी भी ख़त्म हो सकता है ज़िन्दगी का सफ़र
— Naaz ishq















