"मैं ने उस सेे सीखा है"

एक ज़माना ऐसा था मैं रूठा रूठा रहता था
अब तो लहजा मीठा है मैं ग़ुस्सा ग़ुस्सा रहता था
एक घुटन सी रहती थी जज़्बात नहीं बहते थे
जिन आँखों में अब नूर है इन
में दरिया बहता था
यक़ीं न होता था मुझ को और किसी की बातों पर
लोगों से तो अब मिलता हूँ तन्हा तन्हा रहता था
दिल के सारे दरवाज़े मैं ने अंदर से बंद किए थे
एक दरीचा मगर खुला रह गया था मुझ से
और उसी से वो अंदर आया और उस ने
ला-इल्मी ही सब के सब दरवाज़े खोल दिए
तुम हॅंसते मुस्कुराते रहना
दिल की बातें खुल के कहना
मैं जो कोई रोज़ चली भी जाऊॅं
अपने आप से मिलते रहना
और उस ने ये जाते वक़्त कहा था
कि नाज़ ज़िंदगी खुल के जीना
तुम में और मुझ में बस फ़र्क इतना है
तुम को शायद आता था मैं ने उस से सीखा है

— Naaz ishq

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