"मुहासबा"
दोबारा क्यूँ फिर अब तुम लौट आए हो
ग़मों का सिलसिला भी साथ लाए हो
मशक़्क़त की बहुत तुम को भुलाने में
क़सर छोड़ी न तुम ने याद आने में
ख़ला ओ बे-कली तो आम थी पहले
तुम्हारी दीद ना-उम्मीद थी जैसे
समेटे और फेंके फिर अकेले ने
हमारे वादों के टूटे हुए टुकड़े
उठाते वक़्त मुझ को कुछ चुभे भी हैं
इन्हीं ज़ख़्मों से हर शब खेलता था मैं
ख़ुदा कोई करिश्मा कर गया मोहसिन
इन्हें भी वक़्त आख़िर भर गया मोहसिन
कोई भी रात दिन हाइल नहीं आती
तुम्हारी याद अब बिल्कुल नहीं आती
हमारे भी ख़ुशी से दिन निकलते हैं
तुम्हारे भी ख़ुशी से दिन निकलते हैं
तुम इन ज़ख़्मों को फिर से मत कुरेदो अब
पुरानी बातों को फिर से न छेड़ो अब
दोबारा फिर मेरा तुम दिल दुखाओगे
मुझे तुम इस दफ़ा भी छोड़ जाओगे
सो तज्दीद-ए-मरासिम क्यूँ किया जाए
शिफ़ा ज़ख़्मों को आख़िर क्यूँ छुआ जाए
कि अब मुझ में न हिम्मत है न ताकत है
तुम्हारी अब न आदत है न चाहत है















