होंठों पे ख़ामोशी का लिबादा किए हुए
दिल में कोई है शोर शराबा किए हुए
गुज़री हयात यूँॅं कि ज़माने गुज़र गए
हम को किसी भी शह की तमन्ना किए हुए
कुछ लोग रोज़ लज़्ज़त-ए-गिर्या उठा रहे
इक उम्र हो गई हमें ऐसा किए हुए
लम्बे ख़ुशी के सिलसिले दुख हैं गिने चुने
हम हैं कि इतने में ही गुज़ारा किए हुए
पहले पहल जो अहद किए थे हम आख़िरश
सब कुछ भुला के ख़ुद से हैं वा'दा किए हुए
अब क्या करें कि नौकरियाॅं छोड़ दी हैं यार
शौक़-ए-सुख़न को हद से ज़ियादा किए हुए
कैसे बताए नाज़ अब उस को कि उस पे हम
सब जानते हुए भी भरोसा किए हुए
— Naaz ishq















