क्या कहें दोनों का अंजाम रहा एक सा ही
इश्क़ पहला था वही और वही दूसरा भी
वो तरसता था तवज्जोह को मेरी और उस पर
बन गया बोझ किसी रोज़ मेरा देखना भी
बारहा इश्क़ किया हम ने कि हर लड़की के पास
वही अफ़साने वही उज़्र वही मजबूरी
तुम ने बस हाथ मिलाया कि मुक़द्दर बदले
ग़लतियाँ तुम ने की लेकिन सज़ा मैं ने भुगती
बात करता था फ़क़त तर्क-ए-त'अल्लुक़ की मैं
लेकिन उस शख़्स ने इक रोज़ किया हौसला भी
— Naaz ishq















