"इक लड़की सीधी साधी सी"

इक लड़की सीधी साधी सी
उस से रोज़ मुख़ातिब होता हूँ
रोज़ कुछ ऐसी बात आती है
कोई सवाल आता है ऐसा
वो जिस से भाग जाती है
हम दोनों की इक आदत है
मेरी कुछ ज़्यादा बतलाना
और उस की हर बात छुपाना
बातों बातों में ही गर कोई
बात जो निकली और कहीं तो
बात बदलने लगती है
कोई बात छुपाने लगती है
उस से हाल-ए-दिल पूछूॅं तो
ग़ज़ल सुनाने लगती है
गाने गाने लगती है
एक मुखौटा पहना है बस
और वो इतनी देर से पहना है कि
अगर उतारे भी कभी तो
उस को लगता है ऐसा
ये तो और कोई है ना
यूँॅं बात बात पे हॅंसते रहना
सब है अच्छा अच्छा कहना
घर बार यार और ख़ुद से दूर
फिर भी अकेले ख़ुश रहना
है सब झूठ छलावा धोका
इतना ख़ुश तो कोई नहीं होता

— Naaz ishq

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