चार दिन मसअला हुआ होगा
और फिर वो सँभल गया होगा
हम किसी और सबब से बिछड़े थे
उस ने तुम से कुछ और कहा होगा
लौट आना था अब तलक तो उसे
दोस्तों ने मना किया होगा
होगा ख़ामोश मेरे ज़िक्र पे वो
या तो फिर मुस्कुरा दिया होगा
सामना कर भी पाएगा क्या वो
जब कभी मुझ से सामना होगा
औरों को वो हॅंसाता फिरता है
हम समझते थे रो रहा होगा
ख़ुद-कुशी अब उसे सदा देगी
जब कभी कोई हादसा होगा
बढ़ा तो बढ़ता ही गया है बस
बता ये दर्द कब दवा होगा
लौट आने का मसअला नहीं है
मसअला इंतिजार का होगा
— Naaz ishq















