टूट के बिखरे बहुत और बिखरना चाहा
फिर भी वो शख़्स न ठहरा न ठहरना चाहा
अव्वल अव्वल के ग़म-ए-यार में अरसों गुज़रे
आख़िर आख़िर न हुआ प्यार न करना चाहा
लाज रक्खी तेरी तासीर-ए-मसीहाई की
वरना इस दर्द से ता उम्र गुज़रना चाहा
वो हसीं होंठ जब इक़रार किया करते थे
नज़र आता था कि आँखों ने मुकरना चाहा
मुब्तिला हो गए उस वक़्त नए इश्क़ में हम
जब कभी पिछली मुहब्बत से उभरना चाहा
क्या ख़बर कितनी दफ़ा ज़िंदगी से उकता कर
'नाज़' ने रूह-ओ-बदन को जुदा करना चाहा
— Naaz ishq















