ग़मों का काफिला घर से निकल आता हैदवाई लगाता हूँ तो ज़ख़्म छील जाता हैवो सो जाती है चाँद की छाँव में अक्सरहमें नींद आते आते सूरज निकल आता है— Neeraj Saroha