मोहब्बत

उस रोज़ तुम फिर दिखी
काले कुर्ते पर लाल दुपट्टा किसी गुलाब सा था
बड़ी ख़ुश थी तुम सच कहूँ तुम्हें देखना ख़्वाब सा था
जितना सुना था तुम्हारे बारे कहानियाँ सब सच्ची लगती है
अरे पागल मुस्कुराया करो तुम पर अच्छी लगती है
उम्मीद नहीं थी मेरे दिए झुमके पहनोगी
अरे एक मुलाक़ात के लिए क्या इतना सजोगी
तुम्हारा काजल अलग कहानी बयाँ करता है
हर बार तो एक जैसा होता है चलो कुछ नया करते हैं
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में काएनात क़ैद है इन्हें खोल क्यूँ नहीं देती
मोहब्बत है अगर तो बोल क्यूँ नहीं देती

— Nikhil Tiwari 'Nazeel'

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