खौफ़ आईने से लगने लगा है अब सब को
सच किसी शूल सा दिल पे लगा है अब सब को
दुश्मनों को भी अजब डर है मेरी ताक़त का
ग़म का अजगर ही मसकने लगा है अब सब को
तोप तलवार गनों का है ज़माना ये नहीं
ये मोबाइल ही निगलने लगा है अब सब को
ख़ुद के दुख से तो दुखी कोई ज़माने में नहीं
ग़ैर का सुख ही खटकने लगा है अब सब को
मौत महबूब के जैसी है सो ले जाएगी
एक सच और ये खलने लगा है अब सब को
झूठ पर झूठ मढ़ा जाए तो भी सच सच है
सच का सच होना कसकने लगा है अब सब को
'नित्य' ग़मगीन हुए जाते हैं उल्फ़त वाले
नाग नफ़रत का ये डसने लगा है अब सब को
— Nityanand Vajpayee















