अगर वो नाज़-परवर अक़्ल से बच्ची नहीं होती
तो भी होती बहुत प्यारी मगर इतनी नहीं होती
सुधा की देवताई का न होता बोध चंदर को
फ़साने में वो इक क़िरदार अगर पम्मी नहीं होती
ख़ुदा का शुक्र है सखियाँ तुम्हें अच्छी मिलीं वर्ना
तुम्हें मुझ से मोहब्बत क्या पता होती नहीं होती
सुनो माँ-बाप भाई और बहन रिश्ते अहम हैं पर
हुकूमत की ग़ुलामों के बिना हस्ती नहीं होती
जहाँ-भर की हलावत की मैं लज़्ज़त ले के बैठा हूँ
कोई शय उस के होंठों जैसी शीरीनी नहीं होती
मैं ऐसे दिल के दफ़्तर में मुसलसल काम करता हूँ
कि जिस में प्यार होता है कभी छुट्टी नहीं होती
अगर रिश्ता न होता ख़ुद-कुशी का इश्क़ वालों से
कहीं पंखे नहीं होते कहीं रस्सी नहीं होती
तुम्हारी ख़ुश-नसीबी है रक़ीक़-उल-क़ल्ब हो वर्ना
'मिलन' हर दिल के अंदर प्रेम की देवी नहीं होती















