कल रहे कैसा मुक़द्दर क्या भरोसा
कौन हो जाए सितम-गर क्या भरोसा
आज इक दरिया चला है आस ले कर
मिल सके उस को समुंदर क्या भरोसा
दफ़्न हैं वो लोग कू-ए-यार में जो
क़ब्र हो उन को मुयस्सर क्या भरोसा
तुम सभी से फ़ासला रखना ज़रा-सा
दोस्त हो दुश्मन बराबर क्या भरोसा
मत यक़ीं यूँ कीजिए सबकी कही पर
कौन हो झूठा सरासर क्या भरोसा
कल तलक चाहा उसे हाँ ख़ूब चाहा
इश्क़ उस से हो मुकर्रर क्या भरोसा
यूँ न जाता वो अकेला छोड़कर तो
मैं कभी बनता सुख़न-वर क्या भरोसा
— Prashant Prakhar















