कितनी दफ़ा कहूँ वो कहानी मेरीउस पर भी हर दफ़ा मैं ज़बानी मेरीउसे बनाने वाले हाथ मैं चूमूँये थी ख़्वाहिश एक पुरानी मेरीउस की गलियों में जब उठा जनाज़ामुझ को आई याद जवानी मेरीइन फ़ुर्क़त के लम्हों में मरहम हैंजो यादें हैं चंद निशानी मेरीक्या दुनिया में कोई ऐसी भी हैरह ले जो ता-उम्र दिवानी मेरी— Prashant Prakhar