मिरी बनाने को ज़िन्दगी है शमशान आई
उसकी यादें करने हमें परेशान आई
रहना था साथ 'उम्र भर जिस के वो भी तो
कुछ इक दो दिन की ही बनके मेहमान आई
करनी थी लाखों बातें होठों को मेरे
जिस सेे वो आई भी तो बेज़ुबान आई
उधर से आता है उसका ख़त कोई तो फिर
मुझको लगता है जैसे पंकज जान आई
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