मिरी बनाने को ज़िन्दगी है शमशान आई
उस की यादें करने हमें परेशान आई
रहना था साथ उम्र भर जिस के वो भी तो
कुछ इक दो दिन की ही बनके मेहमान आई
करनी थी लाखों बातें होंठों को मेरे
जिस से वो आई भी तो बे-ज़बान आई
उधर से आता है उस का ख़त कोई तो फिर
मुझ को लगता है जैसे पंकज जान आई
— Pankaj murenvi















