डाँटती है बस मुझी को

सुन ज़रा इस ख़ामुशी को

बोलते हैं मुस्कुराओ
छीन कर मेरी हँसी को

दे के आँसू पूछते हैं
क्या हुआ मेरी ख़ुशी को

तुम को आगे बढ़ना है गर
मत सुनो तुम फिर सभी को

चाहते हो सीखना गर
आज़माना ज़िंदगी को
इश्क़ तुम को हो गया गर
दोष मत दो दोस्ती को

खेलकर हैं तोड़ देते
दिल न देना हर किसी को

जान लेती है ये सबकी
तुम न करना आशिक़ी को

आँखों को तकलीफ़ दे जो
छोड़ ऐसी रौशनी को

ज़िंदगी से थक चुका हूँ
रास्ता दो ख़ुद-कुशी को

बेटियों को घूरे जो गर
मारों ऐसे आदमी को

अब नहीं आएँगे मोहन
शस्त्र दो तुम द्रौपदी को

धार लानी होगी इस
में
चाहिए दुख शा'इरी को

नाम करना है जहाँ में
छोड़ दूँ क्या नौकरी को

— Avijit Aman

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