"मैं सो जाता हूँ"
हर दिन रात को
मैं और मेरे कमरे की दीवारें
अक्सर ये बातें करते हैं
ज़िंदगी ऐसे होती तो क्या होता
ज़िंदगी वैसे होती तो क्या होता
जो लड़की महीना भर हो गया शायद मुझ को
तन्हाइयों के दलदल में छोड़कर चली गई थी
वो आज भी अगर साथ होती तो क्या होता
कभी-कभी तो अजीब से ख़याल आते हैं मन में
कि चाँद दिन में और सूरज रात में उगता
तो क्या होता
हमारे पास अलादीन का चराग़ होता तो क्या होता
हम उस से कुछ माँगते क्या वो सचमुच में पूरा होता
यही सब सोचते सोचते
मेरी पलकों पर नींद का पहरा लग जाता है
यही सब सोचते सोचते मैं
ख़्वाबों की नगरी में चला जाता हूँ
और मैं सो जाता हूँ















