Prince Sodhi

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@Princesodhi

Prince Sodhi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Prince Sodhi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ये किताबें हैं जो मुझे सँभाल के रखती हैं वरना ऐसी तन्हाई है कि जिया न जाए — Prince Sodhi
हँसता चेहरा उसे नहीं भाया कर के मुझ को उदास वो ख़ुश है — Prince Sodhi
काम पे जाते वक़्त पिताजी को सर्दी क्यूँँ नईं लगती थी अब ये बात समझ में आई जब ख़ुद पर ज़िम्मेदारी है — Prince Sodhi
फ़क़त दो-चार दिन ज़्यादा हों त्योहारों के मेरे रब बहाने से मुझे होता है पापास गले मिलना — Prince Sodhi
न कोई मेरे साथ तो ग़म नहीं है मेरे वास्ते तुम हज़ारों के जैसी — Prince Sodhi
उस के हाथों में मोबाइल नहीं क़िताबें रहती हैं मैं ने देखा है उस को बिल्कुल मेरे ही जैसी हैं — Prince Sodhi
एक पल में अनगिनत चेहरे बुझाकर रख दिए जाने वाला साथ अपने सबकी ख़ुशियाँ ले गया — Prince Sodhi
ख़ुशी से खिल उठता हूँ मैं जब भी ये सोचता हूँ मेरे साथ तुम लाल जोड़े में कैसी लगोगी — Prince Sodhi

Nazm

"मैं मिलूँगा तुम्हें" दुनिया की‌ परेशानियों से दूर मैं मिलूँगा तुम्हें किसी जंगल में तुम्हारे लिए नज़्में लिखता हुआ अपनी क़लम में तुम्हारे प्यार का रस भरता हुआ पेड़ों से फूलों से तितलियों से तुम्हारी बातें करता हुआ मैं मिलूँगा तुम्हें तुम्हारे ख़्वाब में मैं मिलूँगा तुम्हें बादलों में मैं मिलूँगा तुम्हें हवाओं में मैं मिलूँगा तुम्हें खिलती धूप में हर रंग में हर रूप में हर गली में हर गाँव में हर शहर में मैं मिलूँगा तुम्हें हर जगह पर? अगर कभी ऐसा हो कि मैं तुम्हें कहीं भी दिखाई ना दूँ तो सब सेे आसान तरीक़ा है मुझ सेे मिलने का तुम अपने अंदर झाँक लेना मैं मिलूँगा तुम्हें तुम्हारे ही अंदर तुम्हें प्यार करता हुआ तुम्हारा ख़याल रखता हुआ तुम्हारे लिए जीता हुआ तुम्हारे लिए मरता हुआ मैं मिलूँगा तुम्हें तुम्हारे ही अंदर — Prince Sodhi
"चाय का स्वाद" दिसंबर की इस कपकपाती सर्दी में मेरे हाथ में चाय की एक प्याली है और मुझे हर घूँट के साथ वो पिछले दिसंबर का चाय का स्वाद याद आ रहा है वो अपने फूल से हाथों से चाय बनाती थी और चाय के साथ वो बिस्कुट याद है मुझे और वो दो कप जिन पर मेरा और उस का नाम लिखा था याद है मुझे चाय आज भी अच्छी है पर आज चाय का स्वाद बदल गया हैं बिस्कुट भी बदल गए हैं चाय बनाने वाले हाथ भी बदल गए हैं चाय के लिए जो मेरे पहले जज़्बात थे वो जज़्बात भी बदल गए हैं पर, वो नाम वाले कप आज भी मैं ने अपनी अलमारी में किसी ज़ेवर के जैसे सँभाल कर रखे हैं एक इसी आस में कि क्या पता वो शख़्स किसी शाम लौट आए अपने हाथों से फिर से वो चाय बनाए वही बिस्कुट हो और वही कप हो वही मौसम हो वही वो हो वही हम हो और पहले की तरह हम दोनों चाय पीते-पीते एक दूसरे की बातों में खो जाएँ और काश ये बातें सच हो जाएँ — Prince Sodhi
"बेहद मोहब्बत" उस की मुस्कुराहटें मेरा हाथ पकड़ कर मुझ सेे शा'इरी लिखवाती है उस का चेहरा किसी किताब के जैसा देखो तो कुछ भी नहीं पढ़ो तो बहुत कुछ उस की आँखें किसी समुंदर के जैसी देखो तो कुछ भी नहीं डूबो तो बहुत गहरी चुप-चाप सी रहती है ज़्यादा नहीं बोलती पर उस की आवाज़ सुनो तो कोयल से भी प्यारी उस की ज़ुल्फ़ें ज़्यादा घनी नहीं हैं वैसे तो पर उन में उलझ जाए दुनिया सारी वो छाँव है वो धूप है वो मेरी ज़िंदगी का रंग रूप है वो संगीत है जिस को मैं गुनगुनाता हूँ वो साहिल है मेरा जहाँ मैं ठहर जाता हूँ उस की साँसों में जो महक है वो किसी गुलाब में कहाँ उस के चेहरे सी मासूमियत किसी और चेहरे में कहाँ वो तितलियों से प्यार करती है तितलियाँ फूलों को भूल गई वो छूएगी उन्हें आ कर तितलियाँ उस का इंतिज़ार करती है वही प्यार है वही ख़ुमार है उस पर ही जाँ निसार है मुझे तो उस की हर अदा उस के अंग-अंग से प्यार है मेरी बातों में बातें उस की मेरी साँसों में साँसें उस की मेरी ग़ज़लों में वो बसती है मेरी नज़्मों की वो हस्ती है मेरी नींदों में है ख़्वाब वही मेरी आँखों का है आब वही पास नहीं होती वो मेरे फिर भी मेरे साथ है वो मेरे दिल की धड़कन वो ही जीने की इक आस है वो दिल पे रख के हाथ मैं सच में कहता हूँ प्रिंस वो मेरी जान है मैं उस पे मरता हूँ दुनिया में एलान आज ये करता हूँ उस लड़की से बेहद मोहब्बत मैं करता हूँ — Prince Sodhi
"मैं सो जाता हूँ" हर दिन रात को मैं और मेरे कमरे की दीवारें अक्सर ये बातें करते हैं ज़िंदगी ऐसे होती तो क्या होता ज़िंदगी वैसे होती तो क्या होता जो लड़की महीना भर हो गया शायद मुझ को तन्हाइयों के दलदल में छोड़कर चली गई थी वो आज भी अगर साथ होती तो क्या होता कभी-कभी तो अजीब से ख़याल आते हैं मन में कि चाँद दिन में और सूरज रात में उगता तो क्या होता हमारे पास अलादीन का चराग़ होता तो क्या होता हम उस सेे कुछ माँगते क्या वो सचमुच में पूरा होता यही सब सोचते सोचते मेरी पलकों पर नींद का पहरा लग जाता है यही सब सोचते सोचते मैं ख़्वाबों की नगरी में चला जाता हूँ और मैं सो जाता हूँ — Prince Sodhi