agar ho dost to ye kaam meraa kyun nahin karte | अगर हो दोस्त तो ये काम मेरा क्यूँँ नहीं करते

  - sahil

अगर हो दोस्त तो ये काम मेरा क्यूँँ नहीं करते
किसी ख़ंजर से मेरा चाक सीना क्यूँँ नहीं करते

सर-ए-बाज़ार करते हैं नुमाइश अपने ज़ख़्मों की
कभी उसने कहा था दिल को हल्का क्यूँँ नहीं करते

भटकते फिर रहे हो आसमानी चक्करों में क्यूँँ
बने जन्नत ज़मीं ही ये तमन्ना क्यूँँ नहीं करते

तग़ाफ़ुल आपकी अच्छी नहीं है ख़ुश नहीं हूँ मैं
भरी महफ़िल में मुझको आप रुस्वा क्यूँँ नहीं करते

सितारे चाँद तो होते नहीं हैं सब की क़िस्मत में
मियाँ तुम जुगनुओं से ही गुज़ारा क्यूँँ नहीं करते

बिलखते फिर रहे हो हिज्र जैसी छोटी बातों पर
अमाँ छोड़ो ज़रा दिल को कुशादा क्यूँँ नहीं करते

चलो माना कि तुमको 'इश्क़ ख़ुद से भी नहीं साहिल
दिखावा कर तो सकते हो दिखावा क्यूँँ नहीं करते

  - sahil

Bhai Shayari

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