जो इस में गया है वो समझो मरा है
मुहब्बत में जारी वही सिलसिला है
कभी भी न पूरी मुयस्सर हुई ये
मुझे ज़िंदगी से यही इक गिला है
बुझाती है अब तो चराग़ों को चुन के
ये किस ने हवा को इशारा किया है
जो फल से लदे हैं वो झुक कर हैं मिलते
बिना फल का वो पेड़ कितना तना है
मिरे यार आए नमक ले के मिलने
उन्हें है पता ज़ख़्म मेरा हरा है
गुज़रती है साहिल की शब मय-कदे में
ये इक बे-वफ़ा से वफ़ा का सिला है
— sahil















