main tiri yaadon ko dil men daakhila dene laga | मैं तिरी यादों को दिल में दाख़िला देने लगा

  - sahil

मैं तिरी यादों को दिल में दाख़िला देने लगा
ग़म को यानी अपने दिल का ख़ुद पता देने लगा

सब लगे हैं तुझ को पाने की जुगत में रात दिन
जो ना तुझ को पा सका वो फ़लसफ़ा देने लगा

चोट कुछ ऐसी मिली यारों की महफ़िल में कि बस
मैं तो अपने दुश्मनों को ख़ुद सदा देने लगा

मैं तिरी यादों के जंगल से निकल कर आ गया
ग़म मगर कोई नया फिर मश्ग़ला देने लगा

चाहते हैं वो ज़मीं ये लाश का इक ढेर हो
खून तो उन के लबों को जा़इक़ा देने लगा

ग़म ख़ुशी जो भी है साहिल तुम सँभालो अब इसे
मुझ को तो आवाज़ अब वो मयकदा देने लगा।

  - sahil

Wajood Shayari

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