sahil
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Ghazal

मैं तिरी यादों को दिल में दाख़िला देने लगा

ग़म को या'नी अपने दिल का ख़ुद पता देने लगा

सब लगे हैं तुझ को पाने की जुगत में रात दिन
जो ना तुझ को पा सका वो फ़लसफ़ा देने लगा

चोट कुछ ऐसी मिली यारों की महफ़िल में कि बस
मैं तो अपने दुश्मनों को ख़ुद सदा देने लगा

मैं तिरी यादों के जंगल से निकल कर आ गया
ग़म मगर कोई नया फिर मश्ग़ला देने लगा

चाहते हैं वो ज़मीं ये लाश का इक ढेर हो
ख़ून तो उन के लबों को जा़इक़ा देने लगा

ग़म ख़ुशी जो भी है साहिल तुम सँभालो अब इसे
मुझ को तो आवाज़ अब वो मय-कदा देने लगा।

— sahil

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