"ग़म"
उसी को याद कर के अब बहलते हो
बता भी दो ज़हर तुम क्यूँ निगलते हो
हक़ीक़त है उसे तुम जान कहते थे
भला तुम जान को अब क्यूँ मसलते हो
कहा था दर्द टेलीग्राम को उस ने उड़ा कर के
चलो जाओ मेरे दिल से
मगर फिर भी उसे तुम याद क्यूँ करते रहे रौनक
ग़मों के दौर में चलते रहे रौनक
गए वो छोड़ कर मलते रहे रौनक
बदलना था बदलते दिल तुम्हीं रौनक
उसी के आँख में ढलते रहे रौनक
— Raunak Karn















