ग़म परेशानी की न अब द्वार पर दस्तक रहे
इल्तिजा इतनी जहाँ में हर तरफ़ रौनक रहे
इश्क़ का अंजाम कुछ ऐसा रहे मेरे ख़ुदा
थामकर बाहें मेरी वो ता-कयामत तक रहे
हू-ब-हू है चाँद की मानिंद मेरा हमसफ़र
ऐ ख़ुदा इस चाँदनी पर इक मेरा ही हक़ रहे
है दुआ खुशियाँ रहे हर दो दिलों के दरमियाँ
इब्तिदा-ए-'इश्क़ में आसाँ सदा मस्लक रहे
'वीर' अब मसला नहीं है क्या कहेगा ये जहाँ
है ज़रूरी बस यही महबूब पर न शक रहे
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