मुझ पर लुटा आशिक़ बना मेरे ज़मीनी रंग का
अंजाम मेरे हक़ लिखा उस ने लताफ़त जंग का
मालूम है ये सच मुझे मैं हूँ नहीं कोई परी
उस ने खिला चेहरा दिया जैसे किसी दिल-तंग का
ख़ातिर मिरे अपनी हथेली पर लिए है जान यूँ
जैसे नहीं उस के सिवा महबूब कोई ढंग का
बस एक उस की इस अदा पर यार आबिद हो गई
वो सादगी पे मर गया कामी नहीं है अंग का
यूँ ही नहीं निखरा हुआ है रंग इस बे-रंग का
मुझ को गुमाँ है यार का उस से मिले हम-संग का
— Rubball















