"ज़माना"
हम भी बे-वफ़ा, तुम भी बे-वफ़ा,
अब वफ़ा कहाँ है ज़माने में।
इधर भी काँटे, उधर भी काँटे,
अब फूल कहाँ हैं ज़माने में।
यहाँ भी नफ़रत, वहाँ भी नफ़रत,
अब मुहब्बत कहाँ है ज़माने में।
शाम हुई है, रात हुई है,
अब दिन कहाँ है ज़माने में।
रिश्ते बनाए भी और तोड़े भी,
पर हुनर चाहिए उन्हें निभाने में।
राही भी यहीं और मंज़िल भी यहीं,
पर हम कहाँ हैं ज़माने में।
— Vr Hardik Jaiswal















