तेरे हिस्से जो आए वो मेरी ख़ुशियों के प्याले हों

तेरे सब ज़ख़्म ग़म हरदम यहाँ मेरे हवाले हों

लिखा कुछ है नहीं अरसे से मैं ने अब ये लगता है
विचारों पे मेरे शाइ'र ने पन्ने भर न डाले हों

उलझती ज़िंदगी में बस मुझे इतनी रिफ़ाक़त हो
मेरे अश्कों से पढ़ ले वो जो भी आँखों में नाले हों

सभी ने हाल पूछा है मरीजों का यहाँ लेकिन
उसे पूछा नहीं है जिस ने उस के ग़म सँभाले हों

मेरी आँखें तेरे ख़्वाबों को बस इतनी सलामत दें
तेरी हस्ती को इन आँखों से हरदम बस उजाले हों

कभी लगते नहीं हैं बस्ते भारी उन को कंधों पर
लड़कपन उम्र में जिस ने ये सारे पेट पाले हों

— Sakshi Saraswat

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