ये बेबाकी कहो या कह दो इस को भारी लाचारी
सभी हसरत के ऊपर है हमेशा मेरी ख़ुद्दारी
भले ख़ंजर मिले हर दर पे सारे ग़म मुबारक हो
मुहब्बत से सलामत हो हमेशा दिल की अलमारी
चले आते हैं फिर उस राह पर हम होने को रुस्वा
जो मिटने पर भी चलती है ये है संगीन बीमारी
— Sakshi Saraswat















