इस क़दर दर-बदर नहीं थे हम
जब तेरे हम-सफ़र नहीं थे हम
सूनी रंगीन गलियाँ तकती थीं
पिछली होली भी घर नहीं थे हम
इक मोहब्बत थी उस को भी भूले
इश्क़ में कार-गर नहीं थे हम
ख़ुद को रस्ते में आज खो आए
इतने तो बे-ख़बर नहीं थे हम
तेरी दुनिया के दो सिरे हम थे
हम समझते थे पर नहीं थे हम
मर्ज़ बस तेरा ला-दवा था इक
वैसे कम चारा-गर नहीं थे हम
— Surendra Bhatia "Salil"















