जो कहता है बड़ा मग़रूर हूँ मैं
उसे कहना ज़रा मजबूर हूँ मैं
मैं ख़ाली कुर्सियों को देख कर भी
गुमाँ करता हूँ अब मशहूर हूँ मैं
तुम्हारे पास आने की हवस थी
और अपने आप से भी दूर हूँ मैं
सभी चारा-गरों का घर चलेगा
सदा रिसता हुआ नासूर हूँ मैं
मेरी जानिब न इस हसरत से देखो
किसी की माँग का सिन्दूर हूँ मैं
'सलिल' दिखता रहूँगा महफ़िलों में
अभी थोड़ा सा बा-दस्तूर हूँ मैं
— Surendra Bhatia "Salil"















