खुले जो आँख उतरने में वक़्त लेता है
कोई भी ख़्वाब हो मरने में वक़्त लेता है
है अब भी उस से मोहब्बत तो मसअला कैसा
हो घाव गहरा तो भरने में वक़्त लेता है
तेरी तो याद को भी शाम में बुलाते हैं
ये वक़्त-ए-शाम गुज़रने में वक़्त लेता है
मेरी ख़ता नहीं कोई ये देरी जाएज़ है
वो मेरा यार सँवरने में वक़्त लेता है
हर एक बार उतरता है वो मेरे दिल से
हर एक बार उतरने में वक़्त लेता है
जो इश्क़ इश्क़ कहे जा रहे हैं हसरत को
ये इश्क़ हद से गुज़रने में वक़्त लेता है
जो देख ले मेरी आँखें वही कहे मुझ से
बुरा नशा है उतरने में वक़्त लेता है
कोई डगर भी अब उस की तरफ़ नहीं जाती
वो भी इधर से गुज़रने में वक़्त लेता है















