"ग़फ़लत"
ये कुछ लम्हे ही होते हैं
जो हम जीते हैं ग़फ़लत में
कि इक दिन बैठ फ़ुर्सत में
कसक महसूस कर लेंगे
नहीं होती ख़बर तक भी
कि केवल ये ही लम्हे हैं
हैं शायद सोहबतों के जो
इन्हीं में ख़ुद को जीना है
हमें एहसास तब होगा
कि जब तन्हा कहीं होंगे
न वो होंगे न हम होंगे
फ़क़त हर सू ख़ला होगी
तो अपनी किस्मतों पर या
कि अपनी चाहतों पर भी
न खीझेंगे न रोएँगे
बस अपना मानी ढूँढेंगे
— Surendra Bhatia "Salil"















