अज़िय्यत
शिकायत यूँ तो है मुझ को शिकायत क्यूँ करूँ लेकिन
वो जो चाहे वही समझे वो जो चाहे वही माने
मुझे क्यूँ सोचना उस को जो लाज़िम हो गवारा हो
वो उस मानी में उलझे ख़ुश रहे समझे वही जाने
मेरे हिस्से में था इक गीत मैं ने कह दिया लिखकर
ये अब ता'लीम है उस की वो पहचाने न पहचाने
थे हम कब हम सेफ़र जो अब जुदा होंगे कभी यारों
वो जब तक चाहता हो रह ले फिर जाए ख़ुदा जाने
— Surendra Bhatia "Salil"















