"एक लम्हा"
सारी दुनिया जिसे दिन समझ कर
कारख़ानों की जानिब चली जा रही है
इस को क्या ही ख़बर है
कि चेहरे पे इस के
वक़्त के हाथों
कालिख़ मली जा रही है
किस को मअ'लूम है
हम जिसे दिन समझते हैं
वो रात हो
मैं तो सूरज के उगने को,
दुनिया के उठने को
गाड़ियों के हार्न से
होने वाले शोर और शराबे को
इस जहाँ के ख़राबे को
रात गरदान्ता हूँ
और वो लम्हा कि जब
चाँद की परत पर
एक चेहरा नमूदार हो जाता है
होश खो जाता है
मैं उसी एक लम्हे को दिन मानता हूँ
— Salman Yusuf















