Salman Yusuf

Salman Yusuf

@SalmanYusuf

Salman Yusuf shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Salman Yusuf's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

Ghazal

Nazm

"इक आस" उम्मीदें सिसकियाँ लेती हैं दिल के गहरे कोने में तसल्ली धड़कनें देती हैं नाज़ुक हाथ की मानिंद पलक पर अश्क के मेले यहाँ हर रोज़ लगते हैं लबों पर प्यास की शम्में यहाँ हर शाम जलती हैं मुसलसल दर्द बहता है तो पलकें भीग जाती हैं हुजूम-ए-आदमीयत में फ़क़त मैं ही हूँ तन्हा सा कटे से पैरहन पर कुछ पुराने छींट के धब्बे यही पैग़ाम देते हैं मुझे दुनिया से नफ़रत है मैं एक बोसीदा सी टूटी हुई दीवार के भीतर ख़ुद अपने आप के साए से यूँँ ही लिपटा रहता हूँ हक़ीक़त में मैं ख़ुद इक लाश की मानिंद हूँ लेकिन अभी कुछ साँस बाक़ी हैं अभी इक आस बाक़ी है कि तुम फिर लौट आओगे कि तुम फिर लौट आओगे — Salman Yusuf
"एक ज्योति" ज़िंदगी मुश्किलों का सफ़र है जहाँ नीम तारीक रातें हैं और ख़ार हैं चहार जानिब दजल की वबा आम है इश्क़ उल्फ़त तअ'ल्लुक़ भी व्यापार है लोग अपने होकर भी अपने नहीं अपने चेहरों पे झूठी हँसी ले के दुनिया को गुमराह करने से हरगिज़ नहीं थक रहे मेरे ज़ख़्मों के पकने के है मुल्तमिस यार ज़ख़्मों पे मरहम नहीं रख रहे महव-ए-हैरत हूँ दुनिया के चलने पे मैं रोज़ सूरज के उगने और ढलने पे मैं तीरगी आम है रात बदनाम है हाँ उफ़क़ पर मगर एक दिया जल रहा है जिस की किरणों से राहों में भटके हुए राहगीरों को राह का पता चल रहा है उस की ज्योति से रौशन नहीं आसमाँ उस की किरणों से उठता नहीं ये जहाँ पर अँधेरे की आँखों को एक ज्योति से फूटती रौशनी गड़े जा रही है वो अकेली है लेकिन दर्द तकलीफ़ मअज़ूर मजबूर मुश्किल नामुम्किन से हर दिन लड़े जा रही है उस की हिम्मत को हैरत भरी दाद सारा उफ़क़ दे रहा है उस का लड़ना मुझे आप को ज़िंदगी का सबक़ दे रहा है — Salman Yusuf
लिखना ज़रूरी है लिखो लिखना ज़रूरी है मगर लिखने से पहले ये अख़ज़ कर लो कि क्या लिखना ज़रूरी है वही जो कुछ तुम्हारे दरमियाँ में घट रहा है मुहब्बत का गला क्यूँँ कट रहा है समाज बँट रहा है अख़ुव्वत आजिज़ी और इंकिसारी स भरा बादल फ़ज़ा में नफ़रतों की घुल रहा है छँट रहा है मुहाफ़िज़ इस्मतों के इस्मतों का क़त्ल करते हैं अमीर-ए-शहर ग़रीबों के लहू से पेट भरते हैं लिखो लिखना ज़रूरी है लिखो अब बे-हयाई ने फ़्रीडम नाम रखा है जो ज़िल्लत ख़त्म होनी थी उसी को थाम रखा है हमारे मुंसिफ़ों ने ही हमारे सर हमारे क़त्ल का इल्ज़ाम रखा है सभी तो सर-ब-सज्दा हैं फुहश तहज़ीब के आगे सभी तो ज़ुल्म की ताईद में परचम उठाए हैं मगर कुछ हैं अभी जो कुव्वत-ए-इज़हार रखते हैं वो लहजा तीर रखते हैं ज़बाँ तलवार रखते हैं हमेशा ज़ुल्म की गर्दन पे आहनी वार करते हैं यज़ीद-ए-वक़्त की ताईद से इनकार करते हैं अभी कुछ लोग ज़िंदा हैं लिखो लिखना ज़रूरी है! — Salman Yusuf
"अपनी कहानी" मैं अपनी कहानी क़लमबंद करने की कोशिश तो करता रहा हूँ मगर मेरा माज़ी तो नाकामियों के अँधेरों से उजड़ा हुआ है नहीं याद मुझ को कि उम्र-ए-गुज़िश्ता के इक मरहले में हयात-ए-रवां से रक़ीब-ए-अमाँ से भी वहम-ओ-गुमाँ में कभी जीत पाया मैं लिखने को लिख दूँ कि मैं ने ज़माने से जो कुछ भी चाहा नहीं मिल सका कँवल मेरे ख़्वाबों का हक़ीक़त की बंजर ज़मीनो पे हरगिज़ नहीं खिल सका मैं लड़ता रहा पर हमेशा कि मैं ने कभी भी सर-ए-तस्लीम-ए-ख़म ना किया मैं टूटा मैं बिखरा मैं हारा मगर हौसला फिर भी कम ना किया मैं फिर से चला हूँ सवा लाख कोशिश को एक रंग देने मैं लिखने को लिख दूँ मगर ये कहानी भी पढ़नी है किस ने सभी को तो दुनिया में सक्सेस का नुस्ख़ा ही लाहक रहा है जो हारा नालायक़ जो जीता हमेशा वही तो ज़माने की असली कसौटी पे लायक़ रहा है मेरे फ़ेलियर के तजरबात मुझ को बताने लगे हैं कि मेरी कहानी अधूरी है अबतक इसे दरकिनार है सक्सेस की दस्तक वो सक्सेस जो बहरो के कानों में चीख़े चिल्लाए उन्हे ये बताए कि चलने से पहले कई मर्तबा तुम को गिरना पड़ेगा — Salman Yusuf
"लम्स-ए-आफ़रीन" नुकूश-ए-दिल भी मिट गए ख़याल-ए-जाँ भी अब नहीं जुदाइयों के मरहले जहाँ में बे-सबब नहीं अजीब रुत का हिज्र है हमारे लाशऊर को बस इक तुम्हारी फ़िक्र है तुम्हारी फ़िक्र के तमाम दाएरों की वुसअतों से मैं ही बाख़बर रहा ज़ेर-ए-तेग़-ए-सर रहा हिज्र में भी डर रहा शब-ए-फ़िराक़ में विसाल के गिलास भर रहा नहीं है तू क़रीं मेरे मगर ऐ हम नशीं मेरे मैं घुप अँधेरी रात की तीरगी में जागकर रौशनी के लिए तुझे ही याद कर रहा ऐ मेरी रतजगों में नींद के वजूद को शिकस्त देने वाली गुफ़्तगू के पैरहन अज़ीज़-ए-मन थकन शिकन पलट के आ रुकी हुई हयात को लम्स-ए-आफ़रीन के रिमोट से रिज़्यूम कर — Salman Yusuf
नज़्म- मक़सद-ए-वजूद ज़माँ मकाँ के दरमियाँ है रात दिन का फ़लसफ़ा यहाँ हुजूम-ए इंस-ओ-जाँ कोई इधर कोई उधर भटक रहा है गुमशुदा किसी को है भी ये ख़बर वो कौन है मैं कौन हूँ कि हम सफ़र में हैं अगर तो मंज़िलें हैं किस तरफ़ अगर पता हैं मंज़िलें तो तख़्त की ये जंग क्यूँँ सभी जो एक से है फिर क़ुलूब इतने तंग क्यूँँ ये धर्म ज़ात रंग का ज़मीन पर है फ़र्क क्यूँँ ये जाहिलों के फ़लसफ़े ये अनपढ़ों के तर्क क्यूँँ ये जिस्म गिल का बुत है बस अगर न साँस पास हो शरीर ख़ाक ही का है तुम इस का बस लिबास हो सो जब लिबास उतर गया क़ज़ा की भेंट चढ़ गया तो बल का जो ग़ुरूर था वो अब बचा या मर गया? या फिर किसी को भी यहाँ यही पता न चल सका वो कौन है, मैं कौन हूँ वो कौन है, मैं कौन हूँ — Salman Yusuf