चलता है तेरा ज़िक्र जिधर ख़ुश नहीं रहते
दिखते तो हैं ख़ुश बाश मगर ख़ुश नहीं रहते
हम जैसों के चेहरों पे ही सजती है उदासी
हम लोग कभी अपने भी घर ख़ुश नहीं रहते
इस तरह सुझाते है हमें ख़ुल्द का रस्ता
मर क्यूँ नहीं जाते जो अगर ख़ुश नहीं रहते
कुछ बात है जो दहर का होना है न होना
कुछ बात है जो अहल ए नज़र ख़ुश नहीं रहते
— Salman Yusuf















