ग़म का सामान ही नहीं होता
अहद-ओ-पैमान ही नहीं होता
हाँ मेरे सामने क़यामत है
पर मैं हैरान ही नहीं होता
मैं ने झेला है हिज्र ऐसा एक
अब परेशान ही नहीं होता
वअ'ज़ वो इस लिए नहीं करते
मैं पशेमान ही नहीं होता
कुछ तो राहें बदल ली हम ने भी
कुछ वो क़ुरबान ही नहीं होता
उम्र ज़ाएह हुई तजरबों में
इश्क़ आसान ही नहीं होता
— Salman Yusuf















