गर जाह-ओ-हशम कुर्सी-ओ-मनसब नहीं होता
क़ौमों में लड़ाई का भी मतलब नहीं होता
आती है सदा संग धड़कने की वहीं से
होता था कभी दिल भी जहाँ अब नहीं होता
दीवान दिवाने का दिवानों को दिखाओ
आक़िल से तो दीवान मुरत्तब नहीं होता
— Salman Yusuf
क़ौमों में लड़ाई का भी मतलब नहीं होता
आती है सदा संग धड़कने की वहीं से
होता था कभी दिल भी जहाँ अब नहीं होता
दीवान दिवाने का दिवानों को दिखाओ
आक़िल से तो दीवान मुरत्तब नहीं होता
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