कोई मंज़र है पुर असरार चलो देखते हैं
क्या है कुहसार के उस पार चलो देखते हैं
ये न सोचा था मगर हिज्र है दरपेश सो अब
जीना आसाँ है कि दुश्वार चलो देखते हैं
मैं जो सहरा में अकेला हूँ तो शायद कोई
मिल ही जाए तेरा बीमार चलो देखते हैं
हासिल ए इश्क़ अज़ीयत के सिवा कुछ भी नहीं
कर के पर जुर्रत ए इज़हार चलो देखते हैं
हश्र में कैसे छुपाओगे हक़ीक़त अपनी
कौन है कितना गुनहगार चलो देखते हैं
— Salman Yusuf















