“ज़रूरत-ए-लम्स”

मुहब्बत में बोसा ज़रूरी नहीं
ज़रूरी नहीं तुम कि कलियों को चाहो
और उसपर ये चाहो
कि वो भी जहाँ पर रुकी हैं
रुकी न रहें
मुहब्बत का मतलब ये हरगिज़ नहीं
परिंदों को पिंजरे में पकड़े रखो
उन के पर काट लो
फूल ख़ुश्बू न दे तो वो किस काम का
बिन परों के परिंदे
परिंदे नहीं
जिस्म की तलब तो मुहब्बत नहीं
लम्स की तमन्ना तो उल्फ़त नहीं
इश्क़ को जिस्म की एक ज़र्रा बराबर ज़रूरत नहीं

— Salman Yusuf

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