"सख़्त लम्हें"
वक़्त थोड़ा मुश्किल है
रात थोड़ी भारी है
आँख के कटोरे से
अश्कबारी जारी है
वस्ल की उम्मीदों पर
बेबसी के साए हैं
गुलशनों की राहों पर
नाचती ख़िज़ाएँ है
ये जो सख़्त लम्हें हैं
ये जो स्याह मंज़र है
इस के ख़त्म होने का
वक़्त एक मुक़र्रर है
वक़्त के थपेड़ों का
सामना किया जाए
अब हुसूल-ए-मक़सद का
हौसला किया जाए
क़ब्ल अपने मरने से
थोड़ा जी लिया जाए
— Salman Yusuf















