"रख़्त-ए-सफ़र"

अगर ये रुकना मुहाल न हो
अगर ये अर्जेंट कॉल न हो
न जाने पर गर वबाल न हो
तो मेरी मानो ठहर ही जाओ
न दूर जा कर मुझे सताओ
ये क्या कहा कि नहीं रुकोगे
सफ़र ज़रूरी है चल पड़ोगे
किसी की मिन्नत नहीं सुनोगे
जो ठान ली है तो कर ही दोगे
तो मुझ को मेरा ये दर मुबारक
तुम्हें वो उजला शहर मुबारक
ऐ मेरे पहलू से जाने वाले
नए शहर का सफ़र मुबारक
जो अब सफ़र पर निकल पड़े हो
नई डगर पर जो चल पड़े हो
तो अपने दिल का ख़याल रखना
मेरी मुहब्बत सँभाल रखना

— Salman Yusuf

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