"एक ज्योति"

ज़िंदगी मुश्किलों का सफ़र है जहाँ
नीम तारीक रातें हैं
और ख़ार हैं
चहार जानिब दजल की वबा आम है
इश्क़ उल्फ़त तअ'ल्लुक़ भी
व्यापार है
लोग अपने होकर भी अपने नहीं
अपने चेहरों पे झूठी हँसी
ले के दुनिया को गुमराह
करने से हरगिज़ नहीं थक रहे
मेरे ज़ख़्मों के पकने के है मुल्तमिस
यार ज़ख़्मों पे मरहम नहीं रख रहे
महव-ए-हैरत हूँ दुनिया के चलने पे मैं
रोज़ सूरज के उगने और ढलने पे मैं
तीरगी आम है रात बदनाम है
हाँ उफ़क़ पर मगर एक दिया जल रहा है
जिस की किरणों से राहों में भटके हुए
राहगीरों को राह का पता चल रहा है
उस की ज्योति से रौशन नहीं आसमाँ
उस की किरणों से उठता नहीं ये जहाँ
पर अँधेरे की आँखों को एक ज्योति से
फूटती रौशनी गड़े जा रही है
वो अकेली है लेकिन
दर्द तकलीफ़ मअज़ूर मजबूर
मुश्किल नामुम्किन से हर दिन लड़े जा रही है
उस की हिम्मत को हैरत भरी दाद
सारा उफ़क़ दे रहा है
उस का लड़ना मुझे आप को
ज़िंदगी का सबक़ दे रहा है

— Salman Yusuf

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