नज़्म- मक़सद-ए-वजूद

ज़माँ मकाँ के दरमियाँ
है रात दिन का फ़लसफ़ा
यहाँ हुजूम-ए इंस-ओ-जाँ
कोई इधर कोई उधर
भटक रहा है गुमशुदा
किसी को है भी ये ख़बर
वो कौन है मैं कौन हूँ
कि हम सफ़र में हैं अगर
तो मंज़िलें हैं किस तरफ़
अगर पता हैं मंज़िलें
तो तख़्त की ये जंग क्यूँ
सभी जो एक से है फिर
क़ुलूब इतने तंग क्यूँ
ये धर्म ज़ात रंग का
ज़मीन पर है फ़र्क क्यूँ
ये जाहिलों के फ़लसफ़े
ये अनपढ़ों के तर्क क्यूँ
ये जिस्म गिल का बुत है बस
अगर न साँस पास हो
शरीर ख़ाक ही का है
तुम इस का बस लिबास हो
सो जब लिबास उतर गया
क़ज़ा की भेंट चढ़ गया
तो बल का जो ग़ुरूर था
वो अब बचा या मर गया?
या फिर किसी को भी यहाँ
यही पता न चल सका
वो कौन है, मैं कौन हूँ
वो कौन है, मैं कौन हूँ

— Salman Yusuf

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