ख़मोशी
मैं कि ठहरे हुए पानी की
ख़मोशी से ख़फ़ा हूँ
मेरी ख़्वाहिश कि कोई
बात करे मुझ से मुसलसल
वो कि साकित ही रहा
सूखे दरख़्तों की तरह
लब पे ताले पड़े ऐसे
कि सभी हर्फ़ नदारद
मेरी आहों की सलामी भी
क़ुबूली न गई
मेरी आँखों से गिरे अश्क भी
ख़ाली ही गए
ख़्वाहिश-ए-दीद ने
बस रंज ही बख़्शे यारों
कू-ए-जानाँ से सवाली के सवाली ही गए
लब पे शिकवे न शिकायत
न मलामत न कोई बात
ऐसे रूठे को मनाएँ तो मनाएँ कैसे
— Salman Yusuf















