उनवान - उड़ान
ज़मीं से रब्त भूल जा
परों को आसमान कर
कमंद आफ़ताब पर
क़मर पे तू ध्यान कर
कठिन हैं जो भी मंज़िलें
उन्हीं की सम्त चल निकल
जिन्हे है फ़िक्र आज की
वो क्या बदल सकेंगे कल
जो मुश्क़िलों से डर गए
वो साहिलों पे मर गए
नशा-ए-अब्र उतार दे
तू मौज चीर फाड़ दे
ख़ुदा का इंतिख़ाब तू
बहुत है लाजवाब तू
तू मंज़िलों की सम्त बढ़
न रास्तों की कर फ़िक्र
ये वक़्त है उड़ान का
उड़ान भर उड़ान भर
— Salman Yusuf















