"अपनी कहानी"
मैं अपनी कहानी
क़लमबंद करने की कोशिश
तो करता रहा हूँ
मगर
मेरा माज़ी तो
नाकामियों के
अँधेरों से उजड़ा हुआ है
नहीं याद मुझ को
कि उम्र-ए-गुज़िश्ता के
इक मरहले में
हयात-ए-रवां से
रक़ीब-ए-अमाँ से
भी वहम-ओ-गुमाँ में
कभी जीत पाया
मैं लिखने को लिख दूँ
कि मैं ने ज़माने से
जो कुछ भी चाहा
नहीं मिल सका
कँवल मेरे ख़्वाबों का
हक़ीक़त की बंजर ज़मीनो पे
हरगिज़ नहीं खिल सका
मैं लड़ता रहा पर हमेशा
कि मैं ने कभी भी
सर-ए-तस्लीम-ए-ख़म ना किया
मैं टूटा मैं बिखरा मैं हारा
मगर हौसला फिर भी कम ना किया
मैं फिर से चला हूँ
सवा लाख कोशिश को
एक रंग देने
मैं लिखने को लिख दूँ
मगर ये कहानी
भी पढ़नी है किस ने
सभी को तो दुनिया में
सक्सेस का नुस्ख़ा ही लाहक रहा है
जो हारा नालायक़
जो जीता हमेशा वही तो ज़माने की
असली कसौटी पे लायक़ रहा है
मेरे फ़ेलियर के तजरबात
मुझ को बताने लगे हैं
कि मेरी कहानी अधूरी है अबतक
इसे दरकिनार है सक्सेस की दस्तक
वो सक्सेस जो बहरो के कानों में
चीख़े चिल्लाए
उन्हे ये बताए कि चलने से पहले
कई मर्तबा तुम को गिरना पड़ेगा















