"लम्स-ए-आफ़रीन"

नुकूश-ए-दिल भी मिट गए
ख़याल-ए-जाँ भी अब नहीं
जुदाइयों के मरहले
जहाँ में बे-सबब नहीं
अजीब रुत का हिज्र है
हमारे लाशऊर को
बस इक तुम्हारी फ़िक्र है
तुम्हारी फ़िक्र के तमाम
दाएरों की वुसअतों से
मैं ही बाख़बर रहा
ज़ेर-ए-तेग़-ए-सर रहा
हिज्र में भी डर रहा
शब-ए-फ़िराक़ में विसाल के गिलास भर रहा
नहीं है तू क़रीं मेरे मगर ऐ हम नशीं मेरे
मैं घुप अँधेरी रात की तीरगी में जागकर
रौशनी के लिए तुझे ही याद कर रहा
ऐ मेरी रतजगों में नींद के वजूद को शिकस्त देने वाली गुफ़्तगू के पैरहन
अज़ीज़-ए-मन
थकन शिकन
पलट के आ
रुकी हुई हयात को लम्स-ए-आफ़रीन के रिमोट से रिज़्यूम कर

— Salman Yusuf

More by Salman Yusuf

Other nazm from the same pen

See all from Salman Yusuf →

Neend Shayari

Shers of neend.

All Neend Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling